अभी कुछ दिनों पहले जवाहर लाल नेहरू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया सहित कुछ अन्य छात्रों पर कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाने, देश का विभाजन करने आतंकी अफज़ल की फांसी का विरोध करने के आधार पर देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज किया गया है ! तब से ही भारतीय दंडसंहिता की धारा १२४ A की प्रासंगिकता पर फिर से चर्चा आरंभ हो गयी है.! इस कानून के अनुसार यदि कोई व्यक्ति यदि देश के खिलाफ लिखकर , बोलकर, संकेत देकर या फिर अभिव्यक्ति के ज़रिये विद्रोह करता है या फिर नफरत फैलता है या ऐसी कोशिश करता है तब ऐसी परिस्थिति में उस पर भारतीय दंड संहिता की धारा १२४ A के तहत देश द्रोह का मामला बनता है ! इस कानून के तहत दोषी पाए जाने वाले पर अधिकतम उम्रकैद तक का प्रावधान है !वहीँ इस कानून के दायरे में स्वस्थ्य आलोचना नही आती , की राजद्रोह का सम्बंध हिंसा के लिए उकसाने या फिर अव्यवस्था से है!
हालांकि समय समय पर इस धारा की काफी आलोचना होती रही है , कुछ लोगों के अनुसार ये ब्रिटिश कालीन व्यवस्था है जो अब अप्रासंगिक हो चुकी है ! परन्तु भारत के अधिकांश कानून और भारतीय दंड संहिता की विधियाँ भी ब्रिटिश कालीन ही हैं तो यदि कोई अपराध हो जाता है तो ऐसी परिस्थिति में कानून को अप्रासंगिक कहकर समाप्त तो नहीं किया जा सकता ! वैसे धारा १२४ A के दुरूपयोग को रोकने के लिए सर्वोच्च् न्यायालय के द्वारा व्यवस्था दी गयी है ! न्यायालय ने अनेक ऐसे फैसले सुनाये हैं जिस से यह स्पष्ट होता है कि कोई भी आम हरकत या फिर सरकार की आलोचना भर से ही देशद्रोह का मामला नहीं बनता वरन उस विद्रोह के कारण हिंसा और कानून व्यवस्था की समस्या जैसी स्थिति उत्पन्न होना भी देखा जाता है !!
सर्वोच्च न्यायालय ने १९६२ में केदार नाथ बनाम बिहार राज्य नामक एक वाद में ऐतिहासिक फैसला सुनते हुए फ़ेडरल कोर्ट ऑफ़ इंडिया (ब्रिटिश ) से सहमति जताते हुए सात न्यायाधीशों की पीठ ने निर्णय दिया कि देशद्रोह के मामले में हिंसा को बढ़ावा देने का तत्वा मौजूद होना ज़रूरी है महज़ नारेबाजी देशद्रोह नही मन जा सकता !! एक अन्य वाद बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य १९९५ के मामले में भी न्यायालय द्वारा ये कहा गया कि महज़ दो लोगो के द्वारा बिना और कुछ किये सिर्फ दो बार नारेबाजी करने से देश के सम्मुख कोई खतरा नहीं बनता है !!
दूसरी तरफ कुछ विधि विशेषज्ञों के मुताबिक देशद्रोह की परिभाषा काफी व्यापक है और इस कारण इसके दुरूपयोग की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है !! इसके दुरूपयोग को रोकने के लिए CRPC की धारा १९६ में प्रावधान किया गया है कि देशद्रोह से सम्बंधित दर्ज मामले में पुलिस को चार्जशीट के वक़्त मुकदमा चलाने के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार से सम्बंधित प्राधिकरण से मंजूरी लेना ज़रूरी है !!
हालांकि समय समय पर इस धारा की काफी आलोचना होती रही है , कुछ लोगों के अनुसार ये ब्रिटिश कालीन व्यवस्था है जो अब अप्रासंगिक हो चुकी है ! परन्तु भारत के अधिकांश कानून और भारतीय दंड संहिता की विधियाँ भी ब्रिटिश कालीन ही हैं तो यदि कोई अपराध हो जाता है तो ऐसी परिस्थिति में कानून को अप्रासंगिक कहकर समाप्त तो नहीं किया जा सकता ! वैसे धारा १२४ A के दुरूपयोग को रोकने के लिए सर्वोच्च् न्यायालय के द्वारा व्यवस्था दी गयी है ! न्यायालय ने अनेक ऐसे फैसले सुनाये हैं जिस से यह स्पष्ट होता है कि कोई भी आम हरकत या फिर सरकार की आलोचना भर से ही देशद्रोह का मामला नहीं बनता वरन उस विद्रोह के कारण हिंसा और कानून व्यवस्था की समस्या जैसी स्थिति उत्पन्न होना भी देखा जाता है !!
सर्वोच्च न्यायालय ने १९६२ में केदार नाथ बनाम बिहार राज्य नामक एक वाद में ऐतिहासिक फैसला सुनते हुए फ़ेडरल कोर्ट ऑफ़ इंडिया (ब्रिटिश ) से सहमति जताते हुए सात न्यायाधीशों की पीठ ने निर्णय दिया कि देशद्रोह के मामले में हिंसा को बढ़ावा देने का तत्वा मौजूद होना ज़रूरी है महज़ नारेबाजी देशद्रोह नही मन जा सकता !! एक अन्य वाद बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य १९९५ के मामले में भी न्यायालय द्वारा ये कहा गया कि महज़ दो लोगो के द्वारा बिना और कुछ किये सिर्फ दो बार नारेबाजी करने से देश के सम्मुख कोई खतरा नहीं बनता है !!
दूसरी तरफ कुछ विधि विशेषज्ञों के मुताबिक देशद्रोह की परिभाषा काफी व्यापक है और इस कारण इसके दुरूपयोग की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है !! इसके दुरूपयोग को रोकने के लिए CRPC की धारा १९६ में प्रावधान किया गया है कि देशद्रोह से सम्बंधित दर्ज मामले में पुलिस को चार्जशीट के वक़्त मुकदमा चलाने के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार से सम्बंधित प्राधिकरण से मंजूरी लेना ज़रूरी है !!
अतः अगर समग्र दृष्टि से देखा जाये तो प्रश्न देश द्रोह से कही जादा ऊपर देश के अखंडता और एकता का है और इसकी रक्षा के लिए हम सभी को एकजुट होकर बिना किसी भेदभाव के देश के लिए समर्पित होना चाहिए !! क्योंकि हमारा देश हमारे निजी हित से ऊपर है और इसके लिए किसी भी प्रकार की राजनीति करना या फिर ऐसा कदम उठाना जो इसके लिए खतरा बने बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए !! एक स्वस्थ्य राष्ट्र से ही एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण होगा जिसमे ही हम सब की भलाई है !!






